यह परमात्मा शाश्वत है। इसकी न उत्पत्ति होती है, न इसका विनाश होता है।
इस रहस्यमय ब्रह्माण्ड की प्रत्येक इकाई की उत्पत्ति ‘परमात्मा’ से होती है। स्वयं यह ब्रह्माण्ड भी उसी से उत्पन्न होता है और उसी के कारण क्रियाशील है। वैदिक ऋषियों एवं तांत्रिकों का यह कथन वास्तविकता की जानकारी न होने के कारण एक रहस्य जैसा प्रतीत होता है, और इसी कारण आज का बौद्धिक जगत ‘परमात्मा’ को केवल मानव मन की आस्था मानता है। जो इसके अस्तित्व पर विश्वास करते हैं, वे भी इसे किसी अलौकिक, सातवें आसमान में रहने वाले प्राणी के रूप में कल्पना कर लेते हैं। जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।
वास्तव में ‘परमात्मा’ कोई आकृति या व्यक्ति नहीं है। यह एक अत्यंत सूक्ष्म, अत्यंत तेजस्वी और विलक्षण प्रकार का ‘तत्व’ है—ऐसा मूल तत्व, जो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और इसकी सभी इकाइयों की उत्पत्ति का कारण है। यदि किसी भी पदार्थ का सूक्ष्म से सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए, तो अंततः वही मूल तत्व शेष रह जाता है। इसी कारण इसे ‘परमात्मा’ कहा गया है—अर्थात् परम + आत्मा, जो सबका आधार है।
उपनिषदों में इसी तत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जहाँ तक स्थान का अस्तित्व है, वहाँ तक एक सूक्ष्म, विलक्षण और तेजस्वी तत्व व्याप्त है। यह सर्वत्र समान रूप से विद्यमान है, इसमें कोई भेद नहीं है, कोई आरम्भ और अंत नहीं है। यह ऐसा है, जैसे आकाश सर्वत्र फैला हुआ है—परन्तु उससे भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक।
इसी तत्व को उपनिषदों में ‘आत्मा’ और ‘परमात्मा’ कहा गया है। आधुनिक विज्ञान भी अपनी परिभाषा में कहता है कि जिसको खण्डित न किया जा सके, वही ‘तत्व’ है। इस दृष्टि से यह परम तत्व ही वास्तविक ‘मूल तत्व’ है, क्योंकि अन्य सभी सूक्ष्म तत्व अंततः विभाजित हो जाते हैं।
परमात्मा का वास्तविक स्वरूप
यह समझना आवश्यक है कि ‘परमात्मा’ कोई अलौकिक सत्ता नहीं है, जो किसी विशेष स्थान पर बैठकर इस संसार का संचालन कर रही हो। यदि हम इसे इस प्रकार समझेंगे, तो हम सत्य से भटक जाएंगे और केवल कल्पनाओं में उलझे रहेंगे।
वास्तव में ‘परमात्मा’ एक तेजोमय तत्व है—एक ऐसा ‘सारतत्व’, जिससे यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड निर्मित होता है, जिसका विस्तार, क्रियाएँ, उत्पत्ति और विनाश—सब उसी पर आधारित हैं। इसी कारण इसे ‘परमपिता’, ‘जगत का संचालक’ आदि कहा गया है।
यह तत्व अपने मूल स्वरूप में निर्गुण है—अर्थात् इसमें कोई भी सांसारिक गुण नहीं होता। परन्तु जब इससे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है, तब उसी से विविध गुणों का प्रादुर्भाव होता है। जैसे शांत वायु में कोई गति नहीं होती, परन्तु जब उसमें चक्रवात उत्पन्न होता है, तो अनेक प्रकार की शक्तियाँ उसमें प्रकट हो जाती हैं—उसी प्रकार यह ब्रह्माण्ड भी उस मूल तत्व में उत्पन्न एक प्रकार की गति या विक्षोभ है।
यह ब्रह्माण्ड एक प्रकार का ‘चक्रवात’ है, जो ‘परमात्मा’ में उत्पन्न होता है। अंतर केवल इतना है कि यह चक्रवात स्थायी रूप धारण कर लेता है, क्योंकि इसका आधार अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली तत्व है। इसी कारण यह ब्रह्माण्ड दीर्घकाल तक अस्तित्व में बना रहता है।
यह परम तत्व शाश्वत है। इसकी न उत्पत्ति होती है, न विनाश। इसी कारण इसे ‘अजन्मा’, ‘अविच्छेद’ और ‘अक्षर’ कहा गया है। यह वही मूल तत्व है, जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता और जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है।
हम उसका वर्णन कैसे करें?
प्राचीन ऋषियों ने इस प्रश्न पर गहन विचार किया कि इस तत्व का वर्णन कैसे किया जाए। उन्होंने कहा कि यह बुद्धि, मन, चेतना और वाणी से भी अधिक सूक्ष्म है। जब यह इतना सूक्ष्म है, तो इसका स्थूल वर्णन कैसे संभव है?
यह तत्व अद्भुत है, विलक्षण है। इस ब्रह्माण्ड और इसमें विद्यमान सभी जीवों के गुण उसी से उत्पन्न होते हैं, फिर भी यह स्वयं निर्गुण है। चेतना और अनुभूति की उत्पत्ति भी उसी से होती है, परन्तु यह स्वयं उनसे परे है। यह जीवों की उत्पत्ति का कारण है, परन्तु स्वयं किसी जीव के रूप में सीमित नहीं है।
इस प्रकार यह सम्पूर्ण सृष्टि उसी मूल तत्व की अभिव्यक्ति है। ब्रह्माण्ड का उत्पन्न होना और नष्ट होना उसी की प्रक्रिया का एक भाग है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है—यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
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